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आखिर क्या है कम उम्र में बुढापा – कम आयु में बुढापे के लक्षण व सावधानियां

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Budhapa Kam Umra me Budhapa

विभिन्न प्रकार के शारीरिक मानसिक कारणों से व्यक्ति वक़्त से पहले बुढापे का शिकार हो जाता है। आखिर अल्पायु में बुढापे अथवा वृद्धावस्था का क्या कारण है। कम उम्र में बुढापा आना, उनके कारण, समस्याओं व निवारण पर रोशनी डालता यह आलेख अवश्य पूरा पढ़े।

क्यों होता है कम उम्र में बुढापे का आगमन —

अल्पायु में परिवर्तन के कारण वृद्धावस्था का आगमन — यह संसार परिवर्तनशील है। इस नश्वर संसार में पल प्रतिपल समय बदल रहा है। इसी प्रकार यह मानव जीवन भी पल प्रतिपल आयु के रूप में बदल रहा है। नित नित जवानी से वृद्धावस्था की ओर ढल रहा है। शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था का सफर तय करते करते व्यक्ति के जीवन का सफर कब समाप्ति की ओर आ जाता है। जिम्मेदारियों का बोझ वहन करते करते व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता।

चूँकि परिवर्तन संसार का अटल नियम है। तो व्यक्ति को समय के साथ बुढापा भी अवश्य ही आयेगा। क्योंकि बुढापे की अवस्था ऐसी होती है जिसे कोई भी लेना या जीना नहीं चाहता। लेकिन, यह तो प्रकृति प्रदत्त मिलने वाली अवस्था होती है जिसे हर हाल में व्यक्ति को जीना ही होता है।किंतु, चिन्ता का विषय तब होता है जब व्यक्ति जवानी की उमर में, अल्पायु में ही बड़े बूढो जैसा दिखने लगता है। अब आइये देखते हैं कि अल्पायु में होने वाली वृद्धावस्था (कम आयु में बुढापे) के क्या लक्षण होते हैं ?

अल्पायु में वृद्धावस्था के लक्षण ~

व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाने के कारण कम उमर में ही बुढापा नजर आने लगता है। चेहरे की चमक निस्तेज हो जाती है। आँखें और कपोल अन्दर की ओर धँस जाते हैं। चेहरे पर झांइयाँ और उमर की लकीरें उभर आती हैं। पाचनतन्त्र कमजोर हो जाता है। याददाश्त कमजोर पड़ जाती है। सुन्दर स्वस्थ दाँतों गल कर टूट जाते हैं। व्यक्ति स्मृति भ्रम का शिकार हो जाता है। बाल सफेद हो जाते हैं। प्रकृति विरूद्ध आहार, विहार अपनाना। दिन में सोना और देर रात्रि तक जागना। स्वस्थ चिंतन के स्थान पर अश्लील, कामुक चिंतन आलसी बने रहना। स्वस्थ दिनचर्या को न अपनाना। आदि ऐसे अनेक लक्षण होते हैं जो अल्पायु में व्यक्ति को घेर कर वृद्घावस्था की ओर धकेल देते हैं।

प्राचीन काल से ही ईश्वरीय शक्ति ने जब मानव को इस जीव जगत में भेजा तो मानव के जीवन यापन हेतु ईश्वरीय प्रकृति सहचरी ने मानव शरीर के अनुकूलन हेतु प्राकृतिक संसाधनों को भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराया। जिनका उपयोग करके मानव सुरक्षित रूप से जीवन की निर्धारित आयु जो हमारे शास्त्रानुसार सौ बर्षों की निश्चित की गई है। व्यक्ति उस आयु को निरोगी रहकर व्यतीत किया करते थे।

किंतु अब, इक्कीसवीं सदी के आधुनिक युग के मानव ने स्वयं को अधिक प्रगतिशील और आधुनिक संस्कृति में बदलने के कारण स्वयं अपने ही हाथों अपने विनाश के द्वार खोल दिये हैं। अब व्यक्ति ने पर्यावरण सुरक्षा में सेंध लगाकर वृक्षों का अन्धाधुन्ध कटान किया है। गाँवों से पलायन करके शहर की आबोहवा में चारों तरफ रहने के लिए हरियाली और वृक्षों को काटकर कंक्रीट के नगर बनाकर बसा डाले हैं। फलस्वरूप आज मानव शुद्ध वायुमंडल में आक्सीजन युक्त स्वच्छ श्वांसें लेने के लिए तरस रहे हैं। बच्चें, युवा, बडे, बूढे, बुजुर्ग आज अनेकानेक लोग बहुसंख्या में गले, मुख, नासिका, फेफडे, दमा, एलर्जी, अस्थमा जैसे श्वांस रोग की गम्भीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। ऐसे में बीमार होने के कारण व्यक्ति को अल्पायु में ही बुढापा (कम आयु में बुढापे) आकर घेर लेता है।

जीवन शैली में परिवर्तन —

यदि हम आज से चार पाँच दशक पूर्व की बात करें तो पहले हमारे भारतीय परिवारों में रसोईघर में स्वच्छता के साथ पकाये गए भोजन को हाथ, पैर, मुख धोकर रसोई के समीप चौकी बिछाकर बहुत शांतिपूर्वक एवं प्रेम के साथ भोजन ग्रहण किया जाता था। जिससे भोजन ग्रहण करने वाले व्यक्ति को तृप्ति और आहार ग्रहण करने का आनन्द मिलता था और यह शुद्ध, स्वच्छ षडरस युक्त शक्तिदायक भोजन ही व्यक्ति को ऊर्जायुक्त निरोगी जीवन जीने के लिए प्राणशक्ति का काम करता था। अब आधुनिक तौर तरीके अपनाने के कारण आज का युवावर्ग अपने खानपान पर भी ध्यान नहीं देता।

अब व्यक्ति मशीनी जिन्दगी जीने के साथ ही भागदौड़ भरे जीवन में चलते, फिरते जो भी, जैसा भी भोजन मिलता है । बस व्यक्ति उस भोजन से अपने पेट को भर लेते हैं।डिब्बाबंद भोजन, पिज्जा, बर्गर, पास्ता, नूडल, चाऊमिन, मोमोज जैसे बासी, गरिष्ठ, अधपके भोजन खाता है।
यह सभी डिब्बाबंद भोजन प्रिजर्वेटिव रसायन लगाकर कुछ समय बाद भी खाने योग्य बनाये जाते हैं। जिनको खाने के कारण पाचनतन्त्र पर बुरा असर पडता है।

आँतो और दाँतों को व्यर्थ की तकलीफ देकर व्यक्ति अनेक प्रकार के पेट रोगों के शिकार बन जाते हैं। आज कोरोना वायरस के कारण खानपान में शुद्धता न अपनाने के कारण ही चीन जैसे देश में बीमारी का आतंक फैला हुआ है। इस बढती बीमारी के कारण चीन में लोग अपने घरों में कैद है। कितने ही लोग असमय काल के गाल में समा गये हैं।

आधुनिकता की अंधी चकाचौंध में लिप्त मानव मन की आज सबसे बड़ी समस्या सिनेमा द्वारा परोसी जा रही कामुक और हिंसा युक्त फिल्मों से व्यक्ति के मनोभावों पर पडने वाला दूषित असर भी है। हिंसा, असत्य, अश्लीलता, चोरी, अपहरण, कामुक चिंतन, दूषित विचार, गलत हावभाव की फिल्में देखने से युवा वर्ग के मन पर बहुत बुरा प्रभाव (कम आयु में बुढापे) पडता है।

आज के अधिकांश युवा स्वस्थ चिंतन न होने के कारण भटकाव की ओर चल पड़े हैं। जिसके कारण समाज में चहुँओर नन्हीं मुन्नी बालिकाओं से लेकर वृद्घावस्था की आयु में बढती बलात्कार की घटनायें बेहद दुखद हैं। मोबाइल फोन, आईपाड, कम्प्यूटर, लैपटॉप का उपयोग करने के कारण अनेक बच्चों का कम उमर में ही यू टयूब एवं अन्य साइटों पर अश्लील वीडियो आडियो क्लिप आदि का धडल्ले से देखा जाना। इनसे प्रभावित होकर व्यक्ति स्वयं अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड करते हैं।

जिसके कारण शारीरिक, मानसिक संतुलन में लापरवाही होती रहती है। उपरोक्त कारण से भी व्यक्ति शीघ्र ही वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाता है। चिकित्सकों के अनुसार अब जवान बच्चों में भी ऐसी अनेक बीमारियों के लक्षण मिलते हैं जो पुरातन काल के लोगों में बुढापे की उमर में दिखते थे।
अधिक तेज चटपटे, मिर्च मसालों के सेवन करने से व्यक्ति के मन एवं पाचन तन्त्र पर बुरा असर पडता है। अधिक नमक खाने से भी शरीर की कोशिकाओं का क्षरण होता है। क्योंकि नमक में सोडियम होता है।

क्यों आता है कम उम्र में बुढ़ापा ?

वैज्ञानिकों के अनुसार सोडियम का अधिक असर व्यक्ति की कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। मद्धपान, तम्बाकू अथवा धूम्रपान करने से भी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक स्थिति पर दूषित प्रभाव पडता है। धूम्रपान से व्यक्ति के फेफडे, ह्रदय, पाचनतन्त्र आदि अंग खराब हो जाते हैं। इससे त्वचा का सौंदर्य भी फीका पड जाता है। शराब पीने के कारण लीवर, किडनी, दिल, दिमाग आदि शारीरिक यन्त्र कमजोर हो जाते हैं। जिसके कारण व्यक्ति गम्भीर बीमारियों का (कम आयु में बुढापे) शिकार हो जाते हैं। इन सबका सेवन करने के कारण व्यक्ति अल्पायु में ही बूढे लोगों जैसे दिखने लगते हैं और वृद्घावस्था के शिकार हो जाते हैं।

गुटखा चबाने के कारण व्यक्ति का मुँह, दाँत, जीभ और गाल सड जाते हैं। गुटखे में सुपारी के साथ घातक रसायन मिले होते हैं। यह पदार्थ व्यक्ति की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। जिसके कारण व्यक्ति कैंसर जैसी मृत्युदायक भयानक बीमारी का शिकार हो जाता है।
व्यक्ति जवानी में ही बूढे व्यक्ति जैसा दिखने लगता है। अनेक बार तो आपरेशन कराने के बाद भी पैसों की बरबादी होती है। किंतु बीमारी अधिक बढ जाती है जिसके कारण व्यक्ति काल के गाल में समा जाते हैं।

व्यक्ति का किसी के प्रति मनो मालिन्य हो। अवसाद अथवा विषाद की स्थिति हो तो भी व्यक्ति मानसिक एवं भावनात्मक रूप से कमजोर पड़ जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति के असावधानी वश जीवन गुजारने के कारण एवं उपर्युक्त अन्य अनेक कारणों से ही मानव जवान उमर में ही बुढापे को प्राप्त कर लेते हैं और वृद्धावस्था (कम आयु में बुढापे) का शिकार हो जाते है।

सीमा गर्ग मंजरी, मेरठ

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वृद्धावस्था की समस्याएं – कैसे करे वृद्धावस्था का सामना?

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Vradavastha ki Samsyaye Budhapa

वृद्धावस्था बुढापे में जीवन में अनेक समस्याएं आती है लेकिन हम जीवन शैली को थोड़ा व्यवस्थित कर जीवन को सुखमय बना सकते है। वृद्धावस्था की समस्याओं व उनके निवारण पर ही यह आलेख केंद्रित है। आखिर कैसे वृद्धवस्था का सामना करें व जिंदादिली के साथ जीवन यापन करें।

कैसे करें वृद्धावस्था में ज़िंदादिली के साथ जीवन यापन –

जिस प्रकार से जगत में प्रत्येक दिवस अवसान के बाद निशा का आगमन होना सृष्टि का एक अद्भुत नियम है, ठीक उसी प्रकार से मानव जीवन में प्रत्येक अवस्था को प्राप्त होते हुये इस मानवी जीवन में वृद्धावस्था का आगमन भी एक निश्चित नियम है। किंतु मनुष्य चाहे या ना चाहे उसे काल के अधीन रहना पडता है।

अतः कालवश हठात ही यह बुढापा सभी को आता ही है। आयु के निरन्तर परिवर्तन शील होने के कारण बुढापे की प्रक्रिया को रोका तो नहीं जा सकता। किंतु हाँ, वृद्धावस्था की ढलती आयु को आनंददायक बनाकर जिंदगी को हँसी, खुशी अवश्य ही बिताया जा सकता है। स्वयं को चुस्त व दुरूस्त रखकर अपनी आदतों में सुधार करके व्यक्ति वृद्धावस्था में होने वाले हारमोनल परिवर्तन को कुछ समय के लिये पीछे अवश्य ही खिसका सकता है।

व्यक्ति बढती आयु में भी जवान जैसा चुस्ती फुर्ती युक्त जीवन जी सकता है। और हाँ, एक सार्थक बात यह भी है कि जब हम सभी जानते हैं कि देर सवेर वृद्धावस्था – बुढापा आयेगी ही तो क्यों ना हँसते हँसते बुढापे को अंगीकार करें और सार्थक चिंतन के द्वारा उम्र पर लगाम लगाकर जिंदादिली के साथ जिंदगी जीने के लिए हम सभी को सार्थक व सजग प्रयास अवश्य ही कर लेने चाहिए।

वृद्धावस्था को रोकने के लिए उपाय ~

बुढापे को रोकने के लिए युवावस्था से ही सजगता के साथ योगाभ्यास, कसरत, व्यायाम जैसे लाभदायक क्रिया अभ्यासों को दैनिक दिनचर्या में अपनाना चाहिए। अपने सभी कार्यों को नियत समय पर करने की आदत बना लेनी चाहिये। व्यक्ति को आलस्य भाव का सर्वथा त्याग करना चाहिए। व्यक्ति को संयम व सदाचार को अपनाकर कर्मठता के साथ कर्तव्यनिष्ठ रहना चाहिए। व्यक्ति को सदैव अपने मन में उमंग, तरंग का समावेश रखना चाहिए।  और हँसते हुये, मस्ती के साथ जीने की आदत डाल लेनी चाहिए।

क्योंकि कहते हैं मन चंगा तो कठौती में गंगा —

वृद्धावस्था बुढापे– यदि व्यक्ति का मन जवान है तो वह अपनी सोच, विचार, कार्य, व्यवहार आदि के द्वारा स्वयं के व्यक्तिव पर उमर को हावी नहीं होने देता वरन् जिंदादिली के साथ जिंदगी का यह शानदार सफर आनन्द के साथ तय करता है। व्यक्ति को सदैव सदव्यवहार दया, करूणा, सदाशयता, सौहार्द, परोपकारी मनोवृत्ति को अपनाना चाहिए।

अपने क्रोध पर नियन्त्रण रखना चाहिए। वक्त वे वक्त छोटी बातों पर परिवार के सदस्यों को टोका टाकी करने से बचना चाहिये जिससे परिवार की शांति भंग नहीं होती है। जीवंत प्रकृति अपनाते हुये परिवार एवं व्यवसाय की गहन जिम्मेदारी का निर्वहन अब बच्चों को स्वतन्त्र रूप से करने देना चाहिए। अब इस उम्र में चारों तरफ हाथ पैर न मारते हुये केवल श्रेष्ठ कर्तव्य कर्मों की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

व्यक्ति को चाहिए कि वह हँसमुख व्यक्तिव के धनी मधुरभाषी बनकर रहें। स्वच्छ व सुन्दर धुले वस्त्रों को धारण करना चाहिए। ढीली, ढाली आलसी प्रवृत्ति को त्यागकर सदैव सजग, सचेत रहना चाहिए। वृद्धावस्था में पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। अतः इस अवस्था में व्यक्ति को अपने खानपान का विशेष ध्यान रखते हुये वसा और चर्बीयुक्त खाद्य पदार्थों से दूरी बना कर रखनी चाहिए।

जंकफूड और बाजारी खाने से परहेज करना चाहिए। घर पर तैयार किया गया स्वच्छ, सुपाच्य, हल्का ताजा भोजन करना चाहिए। एक भोजन के बाद दूसरे भोजन के बीच तीन से चार घंटे का समयान्तराल होना चाहिए। अपनी मनपसन्द हॉबी गीत, संगीत, नृत्य, लेखन, मनन चिंतन आदि को अपनाना चाहिए। किसी सीनियर सिटीजन क्लब के सदस्य बनकर अपने हमउम्र लोगों के साथ हँसते खेलते, सकारात्मक, स्वस्थ चर्चा में समय बिताना चाहिए। सदैव सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

इस विषय में एक रोचक किस्सा मुझे याद आता है कि एक बार मैं ट्रैन के सफर से देहरादून जा रही थी तो मेरे सामने की बैंच पर हँसते, मुस्कुराते जोडे के रूप में बुजुर्ग दम्पति भी सफर कर रहे थे। वे दोनों अकेले ही थे। किंतु उनका स्वयं पर आत्म नियन्त्रण और चेहरे पर सुकुन भरा विश्वास देखने लायक था। उन दोनों में इस आयु में भी जीने की ललक देखते ही बनती थी। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि वे दोनों देहरादून घूमने निकले हैं। उनके जीवन के पिचहत्तर बर्ष पूरे होने वाले हैं। अब जीवन की इस संध्या बेला में दो तीन दिन दोनों एक दूसरे के साथ मिलकर बतियाते हुये जीना चाहते हैं। हालांकि वे बेटे बहू पोते पोतियों के भरे पूरे परिवार वाले थे। वे कुछ समय अपने परिवार से चुराकर एक दूजे के साथ की खुशियाँ बटोरने के लिए अकेले घूमने चले आये थे।

वह बता रहे थे कि उनके घर में नौकर चाकर हैं। किंतु हमारे हाथ पैरों में जंग न लग जाये इसलिए हम अपने सारे काम स्वयं करते हैं। उन दोनों की आत्म विश्वास भरी मुस्कान और आँखों में बसी प्रीत भरी चमक मुझे विस्मित कर रही थी। वे दोनों सत्तर के दशक में भी पचास की उमर के नजर आ रहे थे। उनकी सजगता और क्रियाशक्ति उनकी उमर का अंदाजा नहीं लगने दे रही थी। अपनी जिंदगी को ईश्वर का उपहार समझकर उमंग के साथ जीने के लिए खुशी भरे मौके तलाशते एक दूजे के सानिध्य की चाहत रखते वे दम्पति सच में ही आज के युवाओं के लिए भी अनुकरणीय थे।

कैसे बने वृद्धावस्था वरदान ? —

अतः वृद्धावस्था कोई बीमारी नहीं है। फर्क होता है केवल व्यक्ति की सोच का। अतः व्यक्ति को अपनी सोच में सकारात्मक नजरिया रखना चाहिए। व्यक्ति को इस उमर को भी हँसते हुये आनन्दपूर्वक बिताना चाहिए। प्रातः भोर की नवल बेला का प्रारम्भ ईश स्तुति के साथ करना चाहिए। संक्षेप में, इन सभी उपायों को अपनाकर बुढापे को रोकने के साथ ही व्यक्ति अपनी जीवनी शक्ति को बढा सकते है। साथ ही बुढापे में भी व्यक्ति सजग, क्रियाशील रहकर अपने और अन्य दूसरों के लिए भी आनन्ददायक वातावरण का निर्माण कर सकता है। ऐसे हँसमुख, सजग, प्रेरणाशील मानव जहाँ कहीं भी जाते हैं। वहाँ पर अपने जीवन्त सौहार्दपूर्ण व्यवहार से रौनकें लगा देते हैं। ऐसे व्यक्ति ही परिवार, परिचितों एवं मित्रों आदि के लिए प्रेरणास्रोत बनकर नवजवान कहलाते हैं।

सीमा गर्ग मंजरी, मेर

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कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन – कर्म ही जीवन है, कर्म ही जीवन का सार है।

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Karmandyevadhikaraste God Krishna

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन – कर्म ही जीवन है। जीवन बड़ा ही मूल्यवान है। संसार में हर प्राणी जीना चाहता है। जीवन के अमरत्व की खोज में अनेक साधना और अनुसंधान करता रहा है। लेकिन नहीं जानता कि सम्पूर्ण सृष्टि और सृष्टिकार ब्रह्मा और उसकी प्रकृति कर्म प्रधान है। क्योंकि कर्म ही जीवन है। यही सनातन सत्य है। जो प्राणी स्वयं को कर्म से परे मानते हैं वे सभी प्राणी वस्तु मूढ़ एवं मूर्ख है क्योंकि अकर्मणीय प्राणी भी अकर्म कर कर्म को ही फलित करता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन —

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन। कर्म संसार और सांसारिक प्राणियों देवो इत्यादि सुक्ष्माकार की मूल प्रकृति है जिसे माया लीला भी कहा जाता है। कर्म संसार को गतिमान बनाता है, उसमें ऊर्जा से जगत प्रकाशवान है, प्रकृति उसका संवहन करती है। कर्म ही आशक्तियुक्त कर्मनीयता उसका संचार एवं प्रचार करती है। हमारे प्राचीन ज्ञान के स्त्रोत वेद भी हमें कर्मवान बनने की प्रेरणा देते हैं।

कुर्वन्नेवेह अर्थात हमें कर्म करते हुए जीवन जीना चाहिए। मनु स्मृति हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। मनुष्य जीवन सर्वोत्तम जीवन माना गया है जो सर्वदा सत्कर्म पर परम आधार रहा है। मानव जीवन ने हमें चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। यह जीवन का सार रहा है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते – कर्म क्या है —

भगवद् वाणी हमें ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग, और योग मार्ग द्वारा जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करती है। इसमें श्रेष्ठ मार्ग कर्म ही जीवन है। जो सभी मार्गों का मूल्य स्त्रोत है। श्री कृष्ण ने विश्व को निष्काम कर्म करने की मूल शिक्षा दी हैं क्योंकि सम्पूर्ण संसार कर्मोधीन है। हम जैसा कर्म करेंगे या नहीं करेंगे हमें प्रकृति वैसा ही फलित करेगी अर्थात जैसे को तैसा का सिद्धांत प्रतित होता है। यही क्रिया प्रतिक्रिया का नियम चक्र सृष्टि का मूल विधान है। अत: सम्पूर्ण ब्रह्मांड कर्म चक्र द्वारा संचालित है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन। कर्म ही वह सत्य है जो कभी ना तो उत्पन्न हुआ है ना ही नष्ट वरन वह विविध रूपों में रूप परिवर्तित होकर पुन: प्रकट (ज्ञात) होता है। कर्म, अकर्म, सकर्म, दुष्कर्म इत्यादि नामों से हम उन्हें पुकारते हैं लेकिन मूल तो कर्म ही है। सजीव या निर्जीव इससे पूर्णतया प्रभावित होते रहते हैं।

अत: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने सामर्थ्य के अनुसार निष्काम कर्म करें। कर्मशील प्राणियों को श्री (लक्ष्मी) समृद्धि और परमानंद सहज ही प्राप्त होते रहते हैं। जिस प्रकार एक कुम्हार मिट्टी के ढ़ेले से घड़ा, सुराही, दीया आदि जो कुछ बनाना चाहे बना सकता है इसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्म से अभीष्ट फल को प्राप्त कर सकता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते, कर्म की जीवन में क्या उपयोगिता है —

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।अक्सर हमें सत्ता, पद, ऐश्वर्य लक्ष्मी और सम्पदा के लालस में लिप्त होकर स्वयं के कोटर में आसक्त हो जाते हैं यही बन्धन है, यही दुष्परिणाम का मूल कारण है। वेदव्यास महर्षि की रचित भगवद्गीता निष्काम कर्म योगी बनने की प्रेरणा देती है। यह पूर्णत: सत्य है। मनुष्य को कर्मवान बनकर जीवन जीना चाहिए। कर्म साधना ही प्राणियों का मूल लक्ष्य है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन, कर्म किये बिना संसार में जीवन यात्रा चल नहीं सकती। क्योंकि कर्म ही हमारा मूल जीवन है। हमें हर परिस्थिति में समभाव रखकर फल की चिन्ता किए बिना पूर्ण ऊर्जा के साथ कर्मरत रहना चाहिए। मनुष्य का निष्काम कर्म ही आदि जीवन की आधारशीला है। यही सच्चिदानंद की प्राप्ति को सरस-सहज मार्ग है जो प्राणियों की आत्मा को परम बनाकर परमात्मा से साक्षात्कार कराता है।

– राही (हिन्द के स्वर से)

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कर्तव्यपथ, सफलता एवं अंधविश्वास – क्या है सफलता की परिभाषा?

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कर्तव्यपथ-सफलता-अंधविश्वास

जीवन में सफलता केलिए कर्तव्यपथ पर चलना जरूरी है। अंधविश्वास हमारे रास्ते की बाधा है। इस आलेख में हम कर्तव्यपथ, सफलता व अंधविश्वास को समझने का प्रयास कर रहे है।

यह मानव जीवन हमें ईश्वर से वरदान रूप में मिला है। इस मानव जीवन को प्राप्त करने का उद्देश्य एक प्रकार से प्रत्येक मानव के लिए दैनिक जीवन में प्रतिदिन करने वाले कर्तव्य कर्मों को पूर्ण मनोयोग से सम्पादित करना होता है। प्रत्येक व्यक्ति सफल जीवन यापन के द्वारा अपना एवं अपने परिवार का सुचारू एवं व्यवस्थित रूप से भरण पोषण करना चाहता है।

इस जीवन में वही व्यक्ति सफलता प्राप्त करते हैं जो व्यक्ति कर्मठ, परिश्रमशील एवं ईश्वरीय आस्था रखते हैं। ऐसे व्यक्ति परिश्रम एवं लगन के साथ अपने कर्तव्य कर्मो को निष्ठापूर्वक करने के लिए सदैव निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं। जीवन में सफल एवं सुखद जीवन व्यतीत करने के लिए कर्म ही सफलता का मूलमन्त्र कहलाता है |  जो व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए ईश्वर से छप्पर फाड धन प्राप्ति की आशा” नहीं करता वरन् अपनी मेहनत और लगन के बल पर कर्म करता है तभी तो जीवन में सफलता भी उसी व्यक्ति को प्राप्त होती है।

श्रीमद्भागवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि – ”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगो$स्त्वकर्मणि।” अर्थात ~ हे अर्जुन! कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फल की चिंता मत करो। इसलिए कर्म के फल का परिणाम मत बनो केवल अपना कर्म करते रहो।

हमारे सनातन धर्म के ग्रन्थों में कर्तव्य को ही धर्म कहा गया है। धर्म के द्वारा ही मनुष्य सुखभोग को प्राप्त करता है। ”धर्मं ततः सुखम् “ प्राणी जीवन में कर्तव्य से बढकर और कुछ भी नहीं है। अपने कर्तव्य कर्मो को ही जीवन का लक्ष्य समझकर व्यक्ति को सदैव सजग एवं लगन, परिश्रम से लगे रहना चाहिए।

हम सभी प्राणियों को इस जीव जगत में ईश्वर के प्रति आस्था रखकर दैनिक कार्यों को सम्पूर्ण करना चाहिए। नैतिक मूल्यों का अनुसरण करने वाला एवं धर्म का आचरण करने वाला व्यक्ति सदैव ईश्वर कृपा का अनुगामी रहता है। वह नैतिक सदाचार के द्वारा संतोष, संयम, सत्य, त्याग, करूणा आदि गुणों के अनुशीलन द्वारा अपने कर्त्तव्य कर्मों को निपटाता है एवं उत्तरोत्तर सफलता के साथ प्रगति पथ की सीढियाँ चढते चला जाता है। कर्तव्यनिष्ठा से युक्त, मानवीय सदगुणों से सम्पन्न मानव समाज में अपने एवं दूसरों के लिए भी अनुकरणीय मार्ग प्रशस्त करते हैं।

हमारी सोच, विचार, व्यवहार,आचरण, चिंतन आदि के द्वारा ही हम दूसरों के सामने स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं।
इसलिए स्वस्थ चिंतन के द्वारा ही हमारे चरित्र का निर्माण होता है।

आखिर क्या है सफलता, अंधविश्वास व कर्तव्यपथ —

हाँ, यह बात सत्य है कि जीवन में सुखों की अपेक्षा दुख अधिक होते हैं। दुखों से घबराकर व्यक्ति की बुद्धि कुंठित हो जाती है। व्यक्ति अपने दुख, संघर्ष, असफलता की कठिनाइयों से निकलने की कोशिश में इधर उधर हाथ पैर मारने लगता है। परिश्रमशील जीवन को त्यागकर अंधविश्वासी सोच, विचार के बीच घिर जाता है। इसी सोच, विचार को लेकर जब मानव अपने जीवन में दोषपूर्ण जीवन यापन अपनाने लगता है तब व्यक्ति भटक जाता है।

क्योंकि, जब मानव के जीवन में कर्तव्य करने की अपेक्षा सोच, विचारों में अंधविश्वास की जडें गहरी जमने लगती हैं तब ऐसी स्थिति में चाहे वह कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, निश्चित रूप से अंधविश्वास का जीवन जीना ही उसके पतन का कारण बनता है।
हम सभी आये दिन दूरदर्शन एवं समाचार पत्रों के विज्ञापन में ऐसे ही विज्ञापनों को देखते, सुनते, पढ़ते हैं जिनमें अन्धविश्वास की भरमार रहती है।

सच में तो इन विज्ञापनों के द्वारा भोली, भाली, मासूम जनता के पैसे ऐंठकर उनके संवेदनशील मन को भटकाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता है। जिनमें व्यक्ति को बिना किसी प्रयत्न अथवा बिना परिश्रम के ही मुंगेरीलाल के सपने दिखाकर जनता की गाढे परिश्रम से कमाई गई धनराशि को हड़प कर लिया जाता है। इन विज्ञापनों में विशेष रूप से किसी भी देवी, देवता के नाम के लाकेट, रंग बिरंगी अँगूठियाँ, नाना रत्न, मन्त्रादि के द्वारा सिद्ध किये जाने का दावा किया जाता है। घर बैठे खरीदकर पहनने मात्र से जीवन में असफल व्यक्ति को सफल बनाने के शेखचिल्ली के सपने जैसे दिवा स्वप्न दिखाये जाते हैं।

ऐसे झूठे विज्ञापनों पर विश्वास करने वाले लोग अथवा किसी ओझा, तांत्रिक, मांत्रिक, पण्डित पड़िया आदि के पास पहुँच कर बिना परिश्रम किये ही सफलता के सपने खुली आँखों से देखना जैसे कार्य करने वाले व्यक्ति ही अन्धविश्वासी की श्रेणी में आते हैं।

हमारे समाज में बहुत से लोग हमारे आपके आसपास ही बेफिजूल की बातों को मानने और करने वाले अंधविश्वासी लोग होते हैं। ये लोग काला जादू टोना टोटका, अघोरपंथ, गंडा, ताबीज, झाड फूँक जैसे इन बेकार के अंधविश्वासों को मानकर समय और धन की हानि के साथ ही ऐसे लोग अंधविश्वास की जड के कारण अपने परिजनों की जान से भी खेल जाते हैं। गाँव, कस्बे जैसे स्थानों के साथ ही कम पढे लिखे लोगों के मन में अंधविश्वास की जड़े बेहद गहरी जमी होती हैं।

अंधविश्वास व कर्तव्यपथ से विमुख होने का एक उदाहरण – –

इसी विचार को सार्थक करती एक कहानी से यह बात हम भली भाँति समझ सकते हैं ~ मेरी काम वाली बाई कमली एक हफ्ते से बीमार थी। पता चला कि उसका दारूबाज मर्द उसे किसी चिकित्सक से इलाज कराने की जगह नजदीक गाँव के मौलवी के पास ले जाकर झाड़ फूँक करा रहा है। तबियत सुधरने की जगह और गम्भीर हो गयी है।

कमली का रंग दिनोदिन पीला पड़ता जा रहा था। मेरे पास हिसाब के पैसे मांगने आई तो खड़े होते हुए भी कमली के पैर काँप रहे थे। उसकी इतनी खराब हालत देखकर मैने कमली से कहा कि ~ ”कमली तू अच्छे घरों में चौका बरतन करके इतना तो भली प्रकार से समझती है कि इन अंधविश्वास बढाने वाले मुल्ला मौलवियों पर विश्वास करने की जगह अस्पताल में जाकर किसी अच्छे चिकित्सक की सलाह से उपचार कराना चाहिये। किसी अच्छे चिकित्सक की दवा गोली खाती तो अब तक स्वस्थचित्त हो जाती।”

मेरी बात सुनकर कमली बोली कि ~ ”बीबी जी क्या बतलाऊँ आपको मेरा मर्द बहुत अंधविश्वासी है। वह टोने टोटके से ठीक होने में ही विश्वास करता है। वह कहता है कि हमारे यहाँ तो सभी इस गाँव के इलाज से ही ठीक होते हैं। तू अपनी जुबान ज्यादा मत चला। ज्यादा चूँ चपड़ करेगी तो झापड़ खायेगी। तू भी इसी इलाज से ही ठीक होगी, समझीं तू..
शहरी चिकित्सक तो पैसे लूटकर खाल उतारने वाले इलाज करते हैं। मैं तुझे शहर नहीं लेकर जाऊँगा।” मेरे ज्यादा कुछ कहने से दारू पीकर मुझे मारने ,पीटने लगता है। कमली का जबाब सुनकर मैं सोचने लगी कि गाँव वाले कब अंधविश्वास के इस अंधे कुँयें से बाहर निकलेंगे!

कर्तव्यपथ, सफलता व अंधविश्वास को सही तरीके से समझना बहुत जरूरी है —

अब बताइये भला इस प्रकार की विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति किस प्रकार उन्नति पथ को प्राप्त करेंगे। ऐसी अंधविश्वासी सोच वाले व्यक्ति अपने एवं अपने परिजनों के स्वास्थ्य के साथ जाने अनजाने लापरवाही तो करते ही हैं। साथ ही उनके जीवन के साथ खिलवाड़ भी करते हैं। समय बीतने के बाद फिर पछताने के सिवा उनके हाथ कुछ भी नहीं लगता। ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोगों को जागरूक, सजग करने के लिए शिक्षा के द्वारा जन जागरण अभियान चलाया जाना चाहिए।

नुक्कड नाटकों एवं दूरदर्शन के स्वस्थ कार्यक्रमों के माध्यम से भी ऐसे लोगों को जागरूक किया जा सकता है। अतः सफलता प्राप्त करने के लिए अत्यन्त सजग सावधान होकर प्रत्येक व्यक्ति को कर्तव्य कर्म के दायित्व का निर्वाह अवश्य ही करना चाहिए। केवल हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से, अथवा टोने टोटके, ताबीज, झाड़ फूँक जैसी अंधविश्वासी सोच, विचारों से सदैव बचकर रहना चाहिए।

प्राणी को मिले इस अमूल्य जीवन की सार्थकता तभी सिद्ध होगी। जब व्यक्ति मानव जीवन के रूप में मिले इस शरीर, मन, धन, प्राण आदि को कर्तव्यनिष्ठा के साथ भली प्रकार सदुपयोग करना सीख जायेगा।

व्यक्ति को सजग रहकर व्यर्थ के अंधविश्वास में नहीं पड़ना चाहिये। क्योंकि मनुष्य को यह सदैव याद रखना चाहिए कि कोई भी पण्डित, तांत्रिक, मांत्रिक व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार का चमत्कार नहीं कर सकते।

प्रत्येक व्यक्ति को अपना जीवन सफल एवं सुखद बनाने के ईश्वरीय शक्ति पर विश्वास रखते हुये परिश्रमशील कार्य प्रणाली को अपनाने से ही सफलता मिलती है।

निरन्तर उन्नति,प्रगति ऐसे व्यक्ति के कदम चूमती है। हमारे जीवन में कर्म ही सफल जीवन का मूलमन्त्र होता है। कर्म के द्वारा ही सौभाग्य का निर्माण किया जा सकता है।

सीमा गर्ग मंजरी, मेरठ

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