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रामायण के मुख्य पात्र श्रीराम – आखिर क्या है राम होने के मायने? क्या है राम होना? कैसे समझे हम राम को?

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Jai Shri Ram Ramayan

दूरदर्शन पर चल रही रामायण में कल रात रावण की मौत के साथ ही रामायण का मुख्य अध्याय समाप्त हो गया। रावण की मौत के बाद श्रीराम का अयोध्या आगमन व उनका अपने परिवार से मिलन भी हो गया। इस दरम्यान टी.वी. देखते देखते धर्मपत्नि जी भावुक हो गई। श्रीराम का उनकी माताओं के साथ मिलन, वाकई…. रामानंद सागर ने कमाल कर दिया था। रोते-रोते वह उठकर टी.वी. के पास चली गई, मैंने मजाक के तौर पर कुछ दृश्य मोबाइल में कैद कर लिये…।

कौन है राम? क्या है राम होने के मायने? —

सवाल मजाक से शुरू हुआ था लेकिन मेरा मन भी ज्यादा प्रफुल्लित नहीं हो पाया। कैकेयी तो क्रूर माता थी, उनका श्रीराम के साथ मिलन यदि जनमानस को भावुक करता है, तो प्रश्न पैदा होना स्वाभाविक है। दो-तीन दिन से लगातार रामायण के क्रूर पात्रों का मरना जारी था। कुम्भकरण, मेघनाथ व अंत में श्रीराम के हाथों रावण का वध। हर क्रूर राक्षण की मौत के दृश्य में कई घरों में कुछ क्षण के लिए वातावरण भावुक होता रहा, महिलाओं की आँखों में आँसू तैरने लगे… ऐसी खबरें सोशल मीडिया पर खूब चली व प्रत्यक्ष रूप से मैंने घर में भी महसूस किया है…। यदि हमारा मन एक राक्षस की मौत पर भावुक होता है या हमारी आँख में आँसू का कोई कतरा तैरने लगता है तो यकिन माने यही तो ‘राम’ है।

इन दिनों सोशल मीडिया पर ‘श्रीराम’ के पक्ष-विपक्ष में कई पोस्ट हो रही है। राम को समझने व समझाने का चलन भी चरम पर पहुँच गया है। एक मत है जो यह कहता है कि श्रीराम ने माता सीता को अग्निदेव के हवाले करके उनकी छाया को हरण करने का अवसर रावण को दिया था। प्रश्न यह है कि यदि ऐसा था तो श्रीराम को दु:ख किस बात का था? कुछ ज्ञानी लोग यह भी लिखते हैं कि विभीषण ने कुम्भकरण, मेघनाथ व रावण को मारने के लिए गुप्त राज श्रीराम को बताये जिसके फलस्वरूप उनका वध हुआ! सबका अपना-अपना मत है, अपने-अपने विचार है। शालीनता व कानून के दायरे में रहते हुए सबको राय देने, लेने व अपनी बात को रखने का अधिकार भी है।

दरअसल न तो हम श्रीराम को समझ सकते हैं न उनकी पूर्ण व्याख्या कर सकते हैं। न कभी हम पूर्ण संतुष्ट हो सकते हैं न किसी को पूर्ण संतुष्ट कर सकते हैं। कदाचित इसलिए तो विभिन्न रामायण प्रचलित है। भगवान शिव से लेकर हनुमान तक के श्रीमुख से रामायण की व्याख्या की गई, महर्षि वाल्मीकि व गोस्वामी तुलसीदासजी सहित अनेकों ने रामायण का वर्णन किया हैं, ऐसी बातें हम पढ़ते भी है व सुनते भी है। प्रश्न एक ही है कि ‘राम क्या है अथवा राम होना क्या है?’

रामानन्द सागर की रामायण —

33 साल पहले रामानंद सागर ने जब ‘रामायण’ की परिकल्पना की तो लोगों ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी क्योंकि सबको यही लगता था कि फिल्मों को छोड़कर टीवी पर ‘रामायण’ जैसे किसी धारावाहिक की कल्पना करना बेकार है। लेकिन रामानंद सागर ने अपने सपने को सच करके जब छोटे पर्दे पर उतारा तब उस दौर में सड़कें सुनी होने लगी। भारतीय जनमानस ने रामायण जैसे धारावाहिक को जो जगह अपने दिलों में दी, यही तो ‘राम’ है।

‘राम’ रामायण का एक पात्र नहीं, हमारी आत्मा व हमारी सोच है। यदि कोई व्यक्ति मानवीय संवेदनाओं से परे हटकर बात करता है या कोई ऐसी हरकत करता है जो एक इंसान को शोभा नहीं देती तो हम कहते है, ‘बेकार व्यक्ति है, इसमें कोई राम नहीं है।’ राम हमारी आत्मा है, लेकिन हम राम को सहज ही प्राप्त नहीं कर सकते।

Ramayan Ramanand Sagar

Ramayan Ke Ram

कैसे समझे हम राम के व्यक्तित्व को? —

एक क्रूर माता कैकेयी का 14 साल बाद श्रीराम से मिलन होता है, तब यदि हमारी आँखें नम होती है तो हमारे भीतर ‘राम’ है। यदि माता सीता का हरण करने वाले रावण की मौत पर हमारी आँखें नम होती है तो हमारे भीतर ‘राम’ मौजूद है। यदि मेघनाथ की मौत पर हम दु:खी है तो हमारे भीतर ‘राम’ मौजूद है। ‘राम’ हर लक्ष्मण व भरत जैसे भाईयों के दिलों में हैं। राम हर आज्ञाकारी पुत्र में मौजूद है… लेकिन यह सब सहज नहीं है। हम आज्ञाकारी पुत्र हो सकते हैं लेकिन 14 साल तक वनवास नहीं भोग सकते, इसलिए न तो हमारे भीतर ‘राम’ हो सकते हैं न हम लक्ष्मण व भरत जैसे भाई बन सकते हैं।

‘राम’ बनना सहज नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर है….। हम ‘राम’ की कल्पना तो कर सकते हैं लेकिन ‘राम’ बन नहीं सकते क्योंकि हम ‘इंसान’ है व राम इंसान के रूप में ‘भगवान’ है। हो सकता है यदा-कदा हमारे भीतर का राम अंगड़ाई लेता हो, लेकिन वह हमेशा नहीं रह सकता। जब तब हमारे भीतर ‘राम’ को लेकर कोई संदेह जीवित रहेगा तब तक ‘राम’ को न हम समझ सकते हैं न पा सकते हैं।

राम की पहचान क्या है? —

कई लोग प्रश्न करते हैं कि राम भगवान है तो क्या उनकी पूजा अर्चना करके सबकुछ हासिल किया जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि राम वो ‘भगवान’ नहीं है जो आप समझ रहे हैं! धूप, अगरबत्ती या पूजा-अर्चना करके राम से कुछ हासिल नहीं किया जा सकता! हाँ, यदि हमारे भीतर है ‘राम’ है तो बहुत कुछ नहीं, सबकुछ हासिल हो सकता है, क्योंकि ‘राम’ हमारे भीतर का विश्वास है, आत्मशक्ति है जो हमारी पहचान हमसे करवाती है कि ‘हाँ, मैं यह कर सकता हूँ।’ राम हमारी आत्मा है, राम हमारे भीतर का आत्मविश्वास है, मानवीय संवेदनाओं का प्रतिबिम्ब है, जो हमें ‘इंसान’ बनाता है, ऐक ऐसा इंसान जो कैकेयी व राम के मिलन पर भावुक होता है। कदाचित ‘राम’ वह शब्द है जिसको न मैं आपको समझा सकता हूँ न आप समझ सकते हैं।

(विचारों का सहमत होना जरूरी नहीं, शेयर कर सकते है, कॉपी पेस्ट करे तो दैनिक हिंदी डॉट इन नाम अवश्य लिखें।)

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व्यंग्य – परम्परागत मारवाड़ी चूरमे की कहानी व कहानी के खास सबक, खास अंदाज में।

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Rajasthan Marwadi Churma

हमारे राजस्थान में, विशेषकर हमारे मारवाड़ क्षेत्र में घर में खास मेहमान आने पर, सगाई या विवाह आदि में विशेष अवसर पर रोटी (मोटी चपाती) का चूरमा बनाने का रिवाज है। इस रिवाज में सभी मेहमान एक साथ गोलाकार में बैठते हैं। बीच में विशाल परात में रोटीयां डाली जाती है, जिन्हें चुरना होता है। यह काम इस कार्य में निपुण व्यक्ति ही करता है।

प्रायः हर अवसर पर इस कार्य में महारत हासिल एक दो व्यक्ति मिल जाते हैं। बाद में उसमे शुद्ध देसी घी व गुड़ डाला जाता हैं। यह बताना जरूरी है कि इस चूरमे में आम व्यक्ति गुड़ व घी का प्रयोग करते हैं। खास लोग इसमे गुड़ घी के अलावा काजू, द्राक्ष व बादाम वगैरह मिलाकर इसे रईसी रूप देते है। वैसे पहले इस चूरमे के साथ खींचिये पापड़ खाते थें, क्योकि इसके साथ इनका टेस्ट शानदार रहता है। वक्त के साथ पापड़ व खींचिये की जगह ‘नमकीन’ ने ले ली है।

कहानी यह नहीं है, बल्कि अब शुरू होती है।

सबसे पहले तो जो चूरमा बनाता है, वह अपने सुंदर हाथों से रोटियों को तोड़कर व आटा गुथने की तरह चूरमा बनाता है। चूरमा बनाते वक्त हाथों की अंगुलियों में से घी की पिचकारी निकलने की आवाज़ आने तक चूरमा बनता है। इस क्रिया में उसके हाथ घी व चूरमे से लथपथ हो जाते हैं, जिसे धोने के स्थान पर हम ताज़ा रोटी से ही साफ करते है।

फिर शुरू होता है एक दूसरे के मुंह में चूरमे के कवे (कोर) देने की क्रिया। एक दूसरे के मुंह में जबरदस्ती कोर देते है, ज्यादा स्नेह है तो दो बार भी। इस प्रक्रिया में ज्यादातर चूरमा खत्म हो जाता है। मुँह में कोर देने के दौरान एक दूसरे के मुंह व होठ से हाथ टच होता ही होता है, यही तो वास्तविक स्नेह है। अगर जमाई राजा पहली बार ससुराल आये है तब तो स्नेह और भी बढ़ जाता है। साले साहब की पांच अंगुलिया चूरमे का बढ़िया कोर (क्वा) लेकर जीजाजी के मुँह के भीतर तक पहुंच जाती है।

दुनिया कुछ भी समझे लेकिन यह हमारी परम्परा व मेहमान नवाजी के पारंपरिक तरीके हैं, जिसका आज तक हम अक्षरत पालन करते रहे हैं। वैसे आज के मात्र कुछ पढ़े लिखे युवा शायद इसे पसंद न करते हो, कारण दूसरे के मुँह में अपने हाथों से क्वा (कोर) देना। खैर, पोस्ट का उद्देश्य यह है कि कोरोना के बाद यह पारम्परिक मनुहार की यह पद्धति लुप्त न हो जाये। कोरोना लंबे समय तक चला तो धीरे धीरे यह पद्धति या तो लुप्त हो जाएगी या कम होनी शुरू हो जाएगी। वैसे भी हम जमीन से ऊपर उठ चुके हैं तथा भोजन की टेबल तक पहुंच ही चुके हैं।

वैसे इस पोस्ट का एक उद्देश्य दूसरा भी है –
वैसे जो प्रतीकात्मक फोटो यहाँ दिया है, वह चूरमा खाते फ़ोटो नहीं है, क्योकि इसमे बहुत लोग एक साथ होते हैं। अगर वह फ़ोटो देता तो हो सकता है कोई रिश्तेदार नाराज़ हो जाये, चूरमे के चक्कर में मैं पीट जाता, इस डर से 5 साल पहले एक पार्टी में खाना खाते फ़ोटो दे रहा हूँ।

इस फोटो का भी अपना खास मकसद है। यह फोटो आजकल की आधुनिक बफर सिस्टम पार्टियों का फोटो है। जिसमे भोजन करने वाला 100-200 लोगों की लंबी कतार में थाली लेकर खड़ा होकर अपनी बारी का इंतज़ार करता है तथा बारी आने पर थाली में अपनी पसंद की वस्तुएं भरकर एक तरफ का कोई कोना ढूंढता है ताकि कोई डिस्टर्ब न करें। ऐसे ही तथाकथित एक पार्टी में अंधेरे कोने में कुछ गुलाब जामुन जबरदस्ती निगलने का प्रयास करते हुए यह सज्जन, पहचान ही गए होंगे?

वैसे आने वाले समय में यह परम्परा किसी न किसी रूप में जीवित रहेगी। इसका नकारात्मक प्रभाव यह है कि दोबारा भीड़ में न जाना पड़े इस लालच में कुछ लोग ज्यादा भोजन लेते हैं। वह भोजन पार्टी समाप्ति के बाद नालियों में कुत्ते खाते नज़र आते हैं। जहाँ कुत्तों की कमी है वहाँ कचरे के ढेर में गाय या सांड वगैरह खाते हैं, या किसी नाली में गुलाब जामुन बहते हुए भी मिल जाएंगे।

देश में करोड़ों लोग भूखे सोते हैं, कई मासूम भूख से व्याकुल कचरे में खाना तलाशते है, इससे हमें क्या?? हम आधुनिक मानव है, अगर हम पार्टी में 100-200 लोगों का खाना व्यर्थ न करे तो लानत है हमारे पैसे वाले होने पर। वैसे आजकल कई पार्टियों में बोर्ड भी टांगते है -”उतना ही लो थाली में, ताकि व्यर्थ न जाएं नाली में।” यह बोर्ड लोग पढ़ते भी हैं, लेकिन भोजन के बाद।

पहले तो जो खाना होता है वह खा पी लेते है, झूठा वगैरह जो छोड़ना होता है वह छोड़ देते हैं क्योंकि कुछ न कुछ झूठा रह ही जाता है। (कुछ लोगों पर लागू, सब एक जैसे नहीं होते) फिर दूल्हे या दुल्हन के साथ स्टेज पर फ़ोटो क्लिक कराकर जब घर लौटते हैं तो कोने में पड़े व्यर्थ भोजन को देखकर एक दूसरे को ज्ञान बांटते हुए घर की तरफ चल पड़ते है -”यार खाना व्यर्थ नहीं होना चाहिए इससे कितने लोगों का पेट भरता।” बस ज्ञान बाँटना थोड़ी मना है।

शायद किसी ने बैंक में बैनर टँगा देखा होगा -”अंगूठा लगाने के बाद, अगूँठे की स्यायी दीवार से साफ न करें।” हमें इस बात से कोई लेना देना नहीं कि अगर पढ़ना आता तो वह अँगूठा क्यों लगाते?” बस इसी तरह हम बोर्ड छापते है, ”उतना लो थाली में व्यर्थ न जाये नाली में।”

वैसे पोस्ट का असली मकसद तो दूसरा ही है। वह अगली पोस्ट में क्योकि लम्बी पोस्ट लोग नहीं पढ़ते, लॉक डाउन की वजह से सब व्यस्त है।
क्रमश….. धनराज माली ‘राही’

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एक व्यंग्य – हम बैंगन में भी कोई न कोई इम्युनिटी बताकर बेच सकते है। ??

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Hindi Sahitya Vyngya

अब हम अच्छी तरह ‘आत्मनिर्भर’ बनते जा रहे हैं। ऑनलाइन व ऑफलाइन ऐसे ऐसे मास्क बनने लगे हैं कि उन मास्कों की शक्ल देखकर एक बार तो कोरोना भी अपना मुँह छुपा कर देश से भागकर जाएगा।

बाजार में 10 रुपए से 1000 रुपए तक मास्क उपलब्ध है। ऑनलाइन पर तो आपको शक्ल पर सेट होने वाले मास्क भी मिलेंगे। पता नहीं कौन नामालूम लोग हैं जो दिनभर गरीबी, आर्थिक मंदी, मजदूरों व कोरोना से चौपट व्यापार की चर्चा करते हैं? सब बकवास लगता है मुझे तो क्योंकि सैकड़ो रुपए के बिकते मास्क बता रहे हैं कि मंदी दूर दूर तक नहीं है।

मेरे जैसे कुछ शक्ल से निकम्में दिखने वाले लोग 10 रुपए का मास्क लगाकर या हाथ रुमाल बाँधकर निकलते हैं तो, ऐसा लगता है कि ‘इंसानों की भीड़ में कोई बंदर टहल रहा है।’ ऐसे मास्क में कोरोना जबरदस्ती घुस जाएगा, अच्छा मास्क यूज़ करना चाहिए।

खैर, कल एक दुकान में सेनेटाइजर देखा, पैर से दबाते हैं तो हाथ पर गिरता है ऐसा सेनेटाइजर। हाथ सेनेटाइजर करते ही उसे सूंघा तो ऐसा लगा बेहोश हो जाऊंगा, इतनी भयंकर खुश्बू थी उसमे। कोरोना का बाप भी होगा तो सेनेटाइजर से न सही उसकी खुश्बू से मर जायेगा।

घर आने के बाद चाय पीने लगा तो उसकी खुश्बू से पता ही नहीं चला कि चाय पी रहा हूँ या सेनेटाइजर। बीबी ने भी टोका -”कुछ खुश्बू आ रही है आपको?” मैंने मना बोल दिया कि नही। अगर सच बोलता तो वह भी खुशबू वाला सेनेटाइजर माँगती, सब्ज़ी के पैसे तो जेब में है नही सेनेटाइजर कहा से लाकर देता।

खैर, जब खुशबू ज्यादा ही सताने लगी तो साबुन से रगड़ रगड़ पर हाथ धोएं तब जाकर सेनेटाइजर साफ हुआ, सोचो कोरोना का क्या हुआ होगा? रात नींद में भी खुश्बू आती रही।

सेनेटाइजर बेचने वाले होलसेल विक्रेता बाजार में घूमते मिले, एक से बढ़कर एक सेनेटाइजर के साथ। एक बोतल 50 रुपए से 400 रुपए तक… बोतल का साइज वही, कीमत अलग अलग। यानी, अच्छा वाला ज्यादा कोरोना नाशक होता होगा।

अब सरकार को चाहिए कि वह ऐसा कोई कीट आम आदमी को मुहैया कराए जिससे हाथ साफ करते ही तुरन्त उसे पता चल जाये कि कोरोना मर गया, नहीं तो कैसे पता चलेगा कि सही मायने में कौनसा सेनेटाइजर यूज़ करना है?? 50 वाला, 100 वाला, 200 वाला या उससे भी भारी? काश कोरोना आँख से दिखता तो तुरंत ही कमबख़्त को को सेनेटाइजर सुंघाकर पता करते।

खैर, अब चिंता की कोई बात ही नहीं है। कल एक जून से दो जून की रोटी केलिए बाजार खुले तो लोग टूट पड़े। देखकर तसल्ली हुई कि देश से कोरोना जा चुका है। न सोशल डिस्टनसिंग न कोई कायदा न कानून। इतनी भारी भीड़ देखकर ऐसा लगा कि कोई एलियन्स वगैरह धरती पर उतर गया है, लोगों से पूछा तो मालूम पड़ा अनलॉक हुए है हम??

हे भगवान! मैं हैरान परेशान। इतना पैसा है लोगों के पास। शॉपिंग करते लोग, नाश्तें के पार्सल पैक करवाते लोग, पानी की बोतलें खरीदते लोग, पता नहीं क्या क्या खरीद रहे थे। इतना पैसा कहा छुपाकर रखते हैं यह लोग? घरों में बन्द लोग आत्मनिर्भर बनकर बाहर निकले तो खुशी हुई व गम भी। गम इस बात का कि मैं कमबख़्त पीछे ही रहा, कल भी पिछड़ा हुआ, आज भी पिछड़ा हुआ।

कल से सोच रहा हूँ जब बाज़ार में खाने पीने की चीज़ें तक इम्युनिटी नाम से बिक रही है तो कोई जुगाड़ करके आत्मनिर्भर बन जाता हूँ।

आप लोग ऐसा कोई आइडिया देवे कि मैं क्या बेचकर आत्मनिर्भर बन सकू। वैसे शर्म तो मुझमें बची नहीं है, इसलिए कुछ भी बेच सकता हूँ। आप सिर्फ आइडिया देवे कि क्या बेचना चाहिए। घबराए नही, वैसे भी हम उस युग में है जहाँ बैंगन में भी कोई न कोई इम्युनिटी बताकर बेच सकते हैं। आपके आइडिया का आकांक्षी –

धनराज माली ‘राही’

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मदर्स-डे !! – माँ शब्द के मायने क्या है? मेरे लिए ‘माँ’ हर युग में सिर्फ ‘माँ’ है।

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Mother s Day Maa

मदर्स-डे!! नाम ही इतना भारी भरकम है कि मुझ जैसे मारवाड़ी व्यक्ति को समझ में नहीं आता। जब हिंदी बमुश्किल समझ में आती है तो अंग्रेज़ी कैसे समझ में आएगी। वैसे भी हम लोग माँ को माँ नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा में ‘बाई’ बोलते हैं। वैसे पढ़े लिखे व सज्जन लोग इस शब्द को ‘काम वाली बाई’ समझते होंगे या जिन्होंने इस शब्द को नहीं सुना वो कुछ और सोचते होंगे।

अब लोग अपनी माँ के गले में बाहे डालकर, उसकी गोद में सर रखकर या माँ के साथ विभिन्न तरह की तस्वीरें शेयर कर अपनी भावनाओं को प्रकट करते हैं। मेरी उम्र हालांकि ज्यादा नहीं है लेकिन फिर भी उस दौर से गुजर ही चुका हूं जहाँ तस्वीरें खिंचवाने केलिए कैमरे वाले को घर बुलाना पड़ता था, इसलिए मेरे पास माँ की ज्यादा तस्वीरें नहीं है। माँ के साथ एक दो तस्वीर बमुश्किल मिलेगी। एक दो तस्वीरें हैं, वह भी किसी तीर्थस्थल पर गए थें तब कोई कैमरे वाला साथ था इसलिए।

हा, कई शादियों में तस्वीरें खींचते थें लेकिन वह उन कैमरे में कैद होकर रह जाती थी। दरअसल उन दिनों कैमरे में रील वाला सिस्टम था, जिन्हें धुलवाने केलिए लेब का सहारा लेना पड़ता था। शादी ब्याह में फ़ोटो जरूर खींची जाती थी, लेकिन शादी होते ही सब भूत उतर जाते थें, इसलिए 90 प्रतिशत शादियों की फ़ोटो की रील वर्षों तक घर में मिलती थी, बाद में वह भी फेंक दी जाती थी। फ़ोटो लेब में नहीं धुलवाने की मुख्य वजह आर्थिक स्थिति थी, खैर विषय से न भटककर यही कहा जा सकता है मेरे पास माँ के साथ एक दो फ़ोटो ही है।

कुछ अच्छी फ़ोटो है लेकिन वह हम लोग मरने की तैयारी के स्वरूप खिंचवाते है। यह कड़वी सच्चाई है कि बुजुर्ग लोग अपनी अच्छी फ़ोटो खिंचवाकर रखते थे, ताकि मरने के बाद उनके बच्चे उनका चेहरा देख सके। हालांकि मेरी माँ ज्यादा उम्र की नहीं थी, लेकिन परिस्थितियों ने उसे बीमार किया व उसकी मौत हो गई। हालांकि वह जीना चाहती थी, लेकिन ईश्वर को उसके अधूरे सपनों से सरोकार नहीं था। उसने असमय घण्टी बजाई… और दुनिया की स्कूल से छुट्टी हो गई।  दरअसल मातृ दिवस, मदर्स-डे का लोग कितना पालन करते हैं यह तो नहीं पता, लेकिन सोशल मीडिया पर जो प्यार उमड़ता है वह कुछ सन्देह पैदा करता है।

मै माँ को बाई बोलता था, पुरुष प्रधान समाज में मेरी माँ की दशा बिल्कुल काम वाली बाई की तरह थी। हालांकि मैने वह दौर नहीं देखा लेकिन माँ बताती थी कि घर में घूँघट व मर्यादा में रहना पड़ता था। सबसे अंत में भोजन करती थी। घर में उन दिनों मवेशियों की संख्या ज्यादा थीं, लिहाजा उनकी भी देखरेख में सहयोग करना पड़ता था। पानी लगभग एक किलोमीटर दूर से सर पर रखकर लाना पड़ता था। बहुत सी सामाजिक कुरीतियां उन दिनों थीं, सब उससे दुःखी थे लेकिन साहस किसी में नहीं था। सबकी यही स्थिति थी, लेकिन स्वीकार करने की हिम्मत शायद किसी में नहीं थी, आज भी नही है। हालांकि हम शहर में थे, जिला मुख्यालय पर फिर भी सामाजिक पाबंदियां चरम पर थी।

आज जब हम सोशल मीडिया पर मदर-डे व महिला सशक्तिकरण की बातें पढ़ते है, उनका वास्तविक जीवन में क्या महत्व है मुझे नहीं मालूम! आज की पढ़ी लिखी, सज्जन महिलाएं या सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली महिलाएं बहुत कुछ लिखती है। कई साहित्यकार महिलाएं, महिलाओं पर बहुत ज्ञान देती है! वह इसलिए कर पाती है क्योंकि उन्हें इन बातों की समझ है। उनकी परवरिश, उनका रहन सहन व उनकी शिक्षा सबका उन पर प्रभाव है। लेकिन डेढ़ किलो चूड़े, पैरों में पौने किलो चांदी के कड़े, चूड़ियों व भीषण गर्मी में मोटे घाघरे, ओरणी में घूँघट की आड़ में पूरा दिन काम करना आज काम वाली बाइयो के बस का विषय नहीं है।

मै जब तक बालिग हुआ तब तक परिस्तिथियां काफी बदल गई थी। चूड़ा बन्द हो गया था, पतली ओरणी पहननी शुरू हो गई थी, पैरों में आधा पौने किलो चांदी के कड़े भी अनिवार्य नहीं थे, दादा दादी थे नही व घर में कोई बड़ा था नहीं इसलिए घूँघट भी समाप्त हो गया था… लेकिन समाज की कुरीतियां फिर भी कुछ जीवित थी।

मेरी माँ पिज़्ज़ा, बर्गर, सैंडविच, पाव भाजी, केक या या बाजारी वस्तु न खाती थी न समझती थी। नाश्ते में चाय के साथ रोटी जैसी परम्परा का चलन था। हा, प्यार वह बिल्कुल आधुनिक माँ जैसा ही करती थी। मुंह भी बनाती थी लेकिन सेल्फी का चलन नहीं था। सब्ज़ी खराब लगने पर वह गुड़ व घी के साथ में रोटी खिलाती थी, पिताजी से छुपकर। साधारण परिवार होने के बावजूद मेरे मांगने पर पता नही कहा से पैसे लाकर देती थी। उसकी मौत के बाद उसकी पेटी से निकले पैसों ने मुझे जिंदगी का मैनेजमेंट समझा दिया था, लेकिन देर हो चुकी थी… पंछी उड़ चुका था।

मुझे माँ की याद आज भी सोने नही देती। पता नही किस मिट्टी की बनी थी, कभी किसी से कोई शिकायत नहीं थी। हर वक़्त खुश रहती थी व सबको खुश रखती थी। लगता नही था कि उसे जिंदगी से कोई शिकायत थी। कुछ अधूरी हसरतों से शायद वह चली गई, इस बात का अफसोस आज भी है। काश उन दिनों मोबाइल का चलन होता तो माँ की गोद में सर रखकर सोते हुए बहुत फ़ोटो खिंचवाता। काश आज माँ होती तो उसके साथ दूर आसमां धरती के मिलन वाली जगह तक पैदल चलता… उससे ढेर सारी बातें करता। बहुत बातें दिल में थी, माँ से कहनी थी लेकिन….।
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