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यात्रा संस्मरण – वो सोमनाथ महादेव मंदिर की अद्धभुत यात्रा

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somnath Mahadev Mandir

सोमनाथ महादेव मंदिर का इतिहास भारतीय संस्कृति का इतिहास है। भारत को सोने की चिड़िया कहने के पीछे ऐसे भारत का ही इतिहास है, जिसे मोहम्मद गौरी जैसे आक्रमणकारियों ने लूटा। पढ़िए यात्रा वृतांत में संस्मरण।

सोमनाथ महादेव मंदिर का इतिहास —

जब भी हम एकान्त में होते हैं तो अक्सर मीठी यादें स्मृति पटल पर अंकित हो जाती हैं। जिन्हें याद करने से ह्रदय का उल्लास व लगाव हो जाने के कारण हमारे नयन सजल हो उठते हैं और मन फिर से एक बार पंछी बनकर उन्हीं स्थानों में डूब, उतरकर चक्कर लगाने लगता है। जब मधुर स्मृति भरे झरोखे के पट खुलते हैं तो कुछ अप्रतिम यादें हमारे मानस पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाती हैं। उन्हीं अमिट यादों में अपनी सोमनाथ यात्रा का एक प्रसंग मुझे बेहद याद आता है। आज जिसे मैं आप सबके साथ सांझा कर रही हूँ।

मुझे अपने परिजनों के साथ सौराष्ट्र गुजरात के सोमनाथ मंदिर से बाबा सोमनाथ का बुलावा आया और यह सब इतनी जल्दी सब हुआ कि मैं महाशक्ति वान बाबा की दयालुता पर आश्चर्य चकित रह गयी। बीते दिसम्बर 2018 में मेरे भैया, भाभी एवं कुछ अन्य परिजन सौराष्ट्र गुजरात के सोमनाथ मंदिर जाकर बाबा सोमनाथ के दिव्य दर्शन लाभ प्राप्त करने का कार्यक्रम बना रहे थे। जैसे ही उनका यह कार्यक्रम मुझे पता चला तो मेरे मन में भी एक हिलोर सी उठी कि मैं भी उन सबके साथ बाबा के दरबार जाकर दर्शन करूँ।

अब तो यह सब जा रहे हैं, क्या पता फिर वहाँ पर दोबारा हम सबका जाना सम्भव हो या न हो। ऐसा सोचकर मैने अपने पति और भाई से मन की बात स्पष्ट कह दी। जिसे सुनकर मेरे भैया भाभी के साथ ही मेरे पतिदेव ने ना नुकर किये बिना ही सोमनाथ मंदिर जाने के लिये हामी भर दी और मुझे बाबा के दरबार में जाने के लिए इजाजत के साथ ही हरी झंडी मिल गयी।

सोमनाथ महादेव मंदिर की अद्धभुत यात्रा —

अब मैंने हँसी खुशी एक सप्ताह के कार्यक्रम के हिसाब से समस्त आवश्यक वस्तुओं के साथ अपना बैग तैयार कर लिया। चूँकि गुजरात में गर्मी रहती है और हम लोग दिसम्बर में जा रहे थे तो वहाँ के हिसाब से हमें अधिक गर्म कपडों की आवश्यकता नहीं पडनी थी। यहाँ हमारे उत्तर प्रदेश में तो दिसम्बर की रात में ठंडी शीत लहर वाली तेज ठंड पडती है। यहां से दिल्ली एअरपोर्ट तक तो हमने गर्म कपडों के साथ गर्म जैकेट भी पहन रखी थी। किंतु गुजरात के होटल में पहुँचने के बाद हमें वह गर्म जैकेट उतारनी पडी।

वहाँ का तापमान सामान्य था क्योंकि वहाँ पर न तो अधिक गर्मी थी और न ही अधिक सर्दी लग रही थी, तापमान बीस, पच्चीस डिग्री के लगभग था।
हवाई जहाज के द्वारा हमें अहमदाबाद तक जाना था। एअरपोर्ट से बाहर निकलने पर पहले से ही बुक किया गया ट्रैवलर वहाँ पर खडा था। अब उससे आगे का रास्ता सोमनाथ तक हमें ट्रैवलर से पहुँचना था। इस आध्यात्मिक यात्रा में मेरे भैया भाभी उनके बच्चें एवं हमारे अन्य कुछ रिश्तेदार भी हमारे साथ थे। हम सभी मिलकर लगभग बीस बाइस सदस्य थे। हम सब हँसते, गाते, मस्ती में झूमते, अन्ताक्षरी बोलते, कार्ड खेलते बीच में किसी रेस्टोरेंट में रूककर भोजन करते अपने गंतव्य तक पहुँच गये।

मेरे तो मन में बाबा सोमनाथ के दर्शन करने की उत्कंठा लगी थी। मन बार ~बार बाबा के दर्शन करने के लिए भाव विभोर हो जाता और मैं उनके दर्शन करने के लिए लालायित हो जाती थी।

प्रातः चार बजे हम सब उठे। नहा धोकर जब होटल के कमरे से बाहर निकले तो सुहानी भोर में शीतलहरों से कँपकँपी सी आने लगी। तब कमरे में आकर हमने गर्म स्वेटर पहने और मन्दिर प्रागंण के लिए निकल पड़े। होटल से मन्दिर पाँच सात मिनट की पैदल दूरी पर थाम दूर सडक से ही मन्दिर की चोटी के दिव्य दर्शन हो रहे थे। भक्तों को पंक्तिबद्ध होकर दर्शन लाभ प्राप्त हो रहा था। वहाँ मन्दिर प्रांगण में पहुँचकर मन्दिर की अनुपम शोभा को देखकर ह्रदय खुशी से झूम उठा।

सोमनाथ महादेव मंदिर —

बाबा सोमनाथ का मन्दिर बहुत विशाल मन्दिर था। भीतरी भाग में खम्बों और परकोटे पर बेहद खूबसूरत चित्रकारी से सजावट की गई थी। अन्दर बाबा के दर्शन करने के लिए मन्दिर प्रांगण में ही प्रसाद के साथ गंगाजल की सुविधा भक्तों के लिए दुकान लगी थी। जहाँ से हमने प्रसाद के साथ गंगाजल भी लिया। मन्दिर प्रांगण बाबा के जयकारों से गूँज रहा था।

सभी भक्तों के ह्रदय में हर्ष, उल्लास और भक्ति व प्रेम की लहरें दौड रहीं थीं। भक्तवृन्द लाइन में लगकर धीरे धीरे बाबा के समीप पहुँचने के लिए आगे बढ़ते जा रहे थे। मन्दिर प्रांगण में चहुँओर साइड में स्थान बना था। जहाँ पर साफ, स्वच्छ दरी बिछी हुई थी। वहाँ पर बहुत से पण्डित जी माथे पर चंदन लगाये हुये थे एवं अनेक भक्तजन भी वहीं बैठकर मन्त्रजाप, माला जाप, साधना, पूजा,अर्चना आदि कर रहे थे।

जब हम बाबा सोमनाथ की पिण्डी के सामने पहुँचे तो वहाँ विशाल पिण्डी के रूप में बाबा के दर्शन किये। वहाँ बाबा की पिण्डी पर चलायमान यन्त्र के द्वारा जो जल हमने सामने भरे कलश में डाला वही गंगाजल हमें लोटे से चढता हुआ सामने पिण्डी पर दिख रहा था। बाबा पर गंगाजल चढाने का समय निश्चित होता है।

वहाँ संध्या समय पिण्डी के खूबसूरत श्रंगार भरे दर्शन भक्तों को होते हैं। उस समय बाबा की असीम शक्ति और कृपा से अभिभूत होकर मैं उनके चरणों में नतमस्तक हो गयी। ह्रदय में प्रेम, अनुराग, श्रद्धा भाव से पूरित होने के कारण नयनों में प्रेमाश्रु छलक आये। तत्पश्चात परिक्रमा करके बाबा की जलहरी से जल अपने ऊपर छिडककर स्वयं को समर्पित करते हुये मैने अपने शीश को बाबा के चरणों में रख दिया।

सोमनाथ मन्दिर प्रांगण के चहुँओर में बहुत विशाल एवं मनोरम स्थल से युक्त बहुत सुन्दर वाटिका बनी है। यहाँ पर यात्रियों के बैठने के लिए बैंच लगी हुई हैं।

मनोरम फूलों और हरियाली से हरा भरा मन्दिर प्रांगण ह्रदय को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। मन बहुत ही अभिभूत हो रहा था। वह स्थान चारों तरफ समुद्र स्थल से घिरा हुआ था। जहाँ ठांठें मारकर समुद्र की अनंत लहरें अद्भुत गर्जन कर रहीं थीं। मानो प्रातः भोर की नवल उमंग लिये दिनकर की रूपहली रश्मियाँ सागर की लहरों से अठखेलियाँ कर रही हों।

यह सुहावना, मनमोहना दृश्य देखकर ऐसा लग रहा था कि सागर भी लालिमा युक्त स्वर्णिम किरणों को बाँहों में भरकर कैद कर लेना चाहता है और सतरंगी किरणें लहरों के साथ खेलती हुई कभी पास तो कभी दूर आती, जाती आँखमिचौली खेल रही हो।

वहीं उस स्थान पर एक ओर खम्बस्थल पर दिशासूचक यन्त्र लगा था। हजारों बर्षों पहले ही जब तक विज्ञान ने उन्नति भी नहीं की थी तबसे यह यन्त्र सटीक निर्णय दे रहा है। ज्योतिष गणना के द्वारा वह दिशा सूचक यन्त्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

रात्रि साढे आठ बजे से मन्दिर प्रांगण के एक ओर संगीत संध्या का मनोरम कार्यक्रम अमिताभ की आवाज में स्लाइड के द्वारा दिखाया जा रहा था। इस कार्यक्रम को देखने के लिए पैंतीस रूपये पर व्यक्ति के टिकट का मूल्य था। रात्रि आठ बजे जब हम वहाँ पर पहुँचे तो वह स्थान लोगों से खचाखच भरा हुआ था |

सब लोगों के दिल में मन्दिर इतिहास को जानने समझने की उत्कंठा थी। जहाँ पर इस कार्यक्रम के द्वारा मन्दिर के संक्षिप्त इतिहास को दिखाया गया था। मन्दिर के गुम्बद पर रंगीन रोशनी में चित्रों के द्वारा रजतपट के प्रसिद्ध कलाकार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन जी की बुलंद और गम्भीर गूँजती आवाज संगीत संध्या में चार चाँद लगा रही थी। इसमें बताया गया कि किस प्रकार से मौहम्मद गौरी ने बहुत बार मन्दिर की सम्पदा को लूटा और मन्दिर की सुन्दरता को नष्ट कर दिया था। किंतु राजा, महाराजाओं के द्वारा एवं एक शिवसाधिका नर्तकी के प्रयास आराधना से मन्दिर का पुनः, पुनः जीर्णोध्दार किया गया।

तत्पश्चात सरदार वल्लभ भाई पटेल, अटल बिहारी वाजपेयी जी एवं अन्य अनेक लोगों के अथक प्रयासों से मन्दिर आज भी अपनी स्थापत्यकला और संस्कृति के भव्य रूप को समेटे हुये है।

इस कार्यक्रम को देखकर हम सब आनंद से अभिभूत हो गये थे। बच्चों को यह कार्यक्रम इतना पसन्द आया कि हम तीन दिन वहाँ पर रहे वो तीनों दिन वह हम सबको भी साथ लेकर संगीत का कार्यक्रम देखने के लिए गये।

वो मनोरम दृश्य और प्रभु प्रेम की भावभरी अनुभूति मुझे भीतर तक मेरे ह्रदय को गहन झंकृत कर गयी। वह सुन्दर छवि आँखों में समाकर रह गयी। मैं आज भी उन देवदुर्लभ पलों को याद करके रोमांचित हो जाती हूँ। बाबा से बार ~बार प्रार्थना करती हूँ कि बाबा मुझे अपने मनोरम स्थलों के दिव्य दर्शन कराते रहें और मुझे बार बार बुलाकर कृतार्थ करते रहें।

सीमा गर्ग मंजरी, मेरठ

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व्यंग्य – परम्परागत मारवाड़ी चूरमे की कहानी व कहानी के खास सबक, खास अंदाज में।

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Rajasthan Marwadi Churma

हमारे राजस्थान में, विशेषकर हमारे मारवाड़ क्षेत्र में घर में खास मेहमान आने पर, सगाई या विवाह आदि में विशेष अवसर पर रोटी (मोटी चपाती) का चूरमा बनाने का रिवाज है। इस रिवाज में सभी मेहमान एक साथ गोलाकार में बैठते हैं। बीच में विशाल परात में रोटीयां डाली जाती है, जिन्हें चुरना होता है। यह काम इस कार्य में निपुण व्यक्ति ही करता है।

प्रायः हर अवसर पर इस कार्य में महारत हासिल एक दो व्यक्ति मिल जाते हैं। बाद में उसमे शुद्ध देसी घी व गुड़ डाला जाता हैं। यह बताना जरूरी है कि इस चूरमे में आम व्यक्ति गुड़ व घी का प्रयोग करते हैं। खास लोग इसमे गुड़ घी के अलावा काजू, द्राक्ष व बादाम वगैरह मिलाकर इसे रईसी रूप देते है। वैसे पहले इस चूरमे के साथ खींचिये पापड़ खाते थें, क्योकि इसके साथ इनका टेस्ट शानदार रहता है। वक्त के साथ पापड़ व खींचिये की जगह ‘नमकीन’ ने ले ली है।

कहानी यह नहीं है, बल्कि अब शुरू होती है।

सबसे पहले तो जो चूरमा बनाता है, वह अपने सुंदर हाथों से रोटियों को तोड़कर व आटा गुथने की तरह चूरमा बनाता है। चूरमा बनाते वक्त हाथों की अंगुलियों में से घी की पिचकारी निकलने की आवाज़ आने तक चूरमा बनता है। इस क्रिया में उसके हाथ घी व चूरमे से लथपथ हो जाते हैं, जिसे धोने के स्थान पर हम ताज़ा रोटी से ही साफ करते है।

फिर शुरू होता है एक दूसरे के मुंह में चूरमे के कवे (कोर) देने की क्रिया। एक दूसरे के मुंह में जबरदस्ती कोर देते है, ज्यादा स्नेह है तो दो बार भी। इस प्रक्रिया में ज्यादातर चूरमा खत्म हो जाता है। मुँह में कोर देने के दौरान एक दूसरे के मुंह व होठ से हाथ टच होता ही होता है, यही तो वास्तविक स्नेह है। अगर जमाई राजा पहली बार ससुराल आये है तब तो स्नेह और भी बढ़ जाता है। साले साहब की पांच अंगुलिया चूरमे का बढ़िया कोर (क्वा) लेकर जीजाजी के मुँह के भीतर तक पहुंच जाती है।

दुनिया कुछ भी समझे लेकिन यह हमारी परम्परा व मेहमान नवाजी के पारंपरिक तरीके हैं, जिसका आज तक हम अक्षरत पालन करते रहे हैं। वैसे आज के मात्र कुछ पढ़े लिखे युवा शायद इसे पसंद न करते हो, कारण दूसरे के मुँह में अपने हाथों से क्वा (कोर) देना। खैर, पोस्ट का उद्देश्य यह है कि कोरोना के बाद यह पारम्परिक मनुहार की यह पद्धति लुप्त न हो जाये। कोरोना लंबे समय तक चला तो धीरे धीरे यह पद्धति या तो लुप्त हो जाएगी या कम होनी शुरू हो जाएगी। वैसे भी हम जमीन से ऊपर उठ चुके हैं तथा भोजन की टेबल तक पहुंच ही चुके हैं।

वैसे इस पोस्ट का एक उद्देश्य दूसरा भी है –
वैसे जो प्रतीकात्मक फोटो यहाँ दिया है, वह चूरमा खाते फ़ोटो नहीं है, क्योकि इसमे बहुत लोग एक साथ होते हैं। अगर वह फ़ोटो देता तो हो सकता है कोई रिश्तेदार नाराज़ हो जाये, चूरमे के चक्कर में मैं पीट जाता, इस डर से 5 साल पहले एक पार्टी में खाना खाते फ़ोटो दे रहा हूँ।

इस फोटो का भी अपना खास मकसद है। यह फोटो आजकल की आधुनिक बफर सिस्टम पार्टियों का फोटो है। जिसमे भोजन करने वाला 100-200 लोगों की लंबी कतार में थाली लेकर खड़ा होकर अपनी बारी का इंतज़ार करता है तथा बारी आने पर थाली में अपनी पसंद की वस्तुएं भरकर एक तरफ का कोई कोना ढूंढता है ताकि कोई डिस्टर्ब न करें। ऐसे ही तथाकथित एक पार्टी में अंधेरे कोने में कुछ गुलाब जामुन जबरदस्ती निगलने का प्रयास करते हुए यह सज्जन, पहचान ही गए होंगे?

वैसे आने वाले समय में यह परम्परा किसी न किसी रूप में जीवित रहेगी। इसका नकारात्मक प्रभाव यह है कि दोबारा भीड़ में न जाना पड़े इस लालच में कुछ लोग ज्यादा भोजन लेते हैं। वह भोजन पार्टी समाप्ति के बाद नालियों में कुत्ते खाते नज़र आते हैं। जहाँ कुत्तों की कमी है वहाँ कचरे के ढेर में गाय या सांड वगैरह खाते हैं, या किसी नाली में गुलाब जामुन बहते हुए भी मिल जाएंगे।

देश में करोड़ों लोग भूखे सोते हैं, कई मासूम भूख से व्याकुल कचरे में खाना तलाशते है, इससे हमें क्या?? हम आधुनिक मानव है, अगर हम पार्टी में 100-200 लोगों का खाना व्यर्थ न करे तो लानत है हमारे पैसे वाले होने पर। वैसे आजकल कई पार्टियों में बोर्ड भी टांगते है -”उतना ही लो थाली में, ताकि व्यर्थ न जाएं नाली में।” यह बोर्ड लोग पढ़ते भी हैं, लेकिन भोजन के बाद।

पहले तो जो खाना होता है वह खा पी लेते है, झूठा वगैरह जो छोड़ना होता है वह छोड़ देते हैं क्योंकि कुछ न कुछ झूठा रह ही जाता है। (कुछ लोगों पर लागू, सब एक जैसे नहीं होते) फिर दूल्हे या दुल्हन के साथ स्टेज पर फ़ोटो क्लिक कराकर जब घर लौटते हैं तो कोने में पड़े व्यर्थ भोजन को देखकर एक दूसरे को ज्ञान बांटते हुए घर की तरफ चल पड़ते है -”यार खाना व्यर्थ नहीं होना चाहिए इससे कितने लोगों का पेट भरता।” बस ज्ञान बाँटना थोड़ी मना है।

शायद किसी ने बैंक में बैनर टँगा देखा होगा -”अंगूठा लगाने के बाद, अगूँठे की स्यायी दीवार से साफ न करें।” हमें इस बात से कोई लेना देना नहीं कि अगर पढ़ना आता तो वह अँगूठा क्यों लगाते?” बस इसी तरह हम बोर्ड छापते है, ”उतना लो थाली में व्यर्थ न जाये नाली में।”

वैसे पोस्ट का असली मकसद तो दूसरा ही है। वह अगली पोस्ट में क्योकि लम्बी पोस्ट लोग नहीं पढ़ते, लॉक डाउन की वजह से सब व्यस्त है।
क्रमश….. धनराज माली ‘राही’

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एक व्यंग्य – हम बैंगन में भी कोई न कोई इम्युनिटी बताकर बेच सकते है। ??

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Hindi Sahitya Vyngya

अब हम अच्छी तरह ‘आत्मनिर्भर’ बनते जा रहे हैं। ऑनलाइन व ऑफलाइन ऐसे ऐसे मास्क बनने लगे हैं कि उन मास्कों की शक्ल देखकर एक बार तो कोरोना भी अपना मुँह छुपा कर देश से भागकर जाएगा।

बाजार में 10 रुपए से 1000 रुपए तक मास्क उपलब्ध है। ऑनलाइन पर तो आपको शक्ल पर सेट होने वाले मास्क भी मिलेंगे। पता नहीं कौन नामालूम लोग हैं जो दिनभर गरीबी, आर्थिक मंदी, मजदूरों व कोरोना से चौपट व्यापार की चर्चा करते हैं? सब बकवास लगता है मुझे तो क्योंकि सैकड़ो रुपए के बिकते मास्क बता रहे हैं कि मंदी दूर दूर तक नहीं है।

मेरे जैसे कुछ शक्ल से निकम्में दिखने वाले लोग 10 रुपए का मास्क लगाकर या हाथ रुमाल बाँधकर निकलते हैं तो, ऐसा लगता है कि ‘इंसानों की भीड़ में कोई बंदर टहल रहा है।’ ऐसे मास्क में कोरोना जबरदस्ती घुस जाएगा, अच्छा मास्क यूज़ करना चाहिए।

खैर, कल एक दुकान में सेनेटाइजर देखा, पैर से दबाते हैं तो हाथ पर गिरता है ऐसा सेनेटाइजर। हाथ सेनेटाइजर करते ही उसे सूंघा तो ऐसा लगा बेहोश हो जाऊंगा, इतनी भयंकर खुश्बू थी उसमे। कोरोना का बाप भी होगा तो सेनेटाइजर से न सही उसकी खुश्बू से मर जायेगा।

घर आने के बाद चाय पीने लगा तो उसकी खुश्बू से पता ही नहीं चला कि चाय पी रहा हूँ या सेनेटाइजर। बीबी ने भी टोका -”कुछ खुश्बू आ रही है आपको?” मैंने मना बोल दिया कि नही। अगर सच बोलता तो वह भी खुशबू वाला सेनेटाइजर माँगती, सब्ज़ी के पैसे तो जेब में है नही सेनेटाइजर कहा से लाकर देता।

खैर, जब खुशबू ज्यादा ही सताने लगी तो साबुन से रगड़ रगड़ पर हाथ धोएं तब जाकर सेनेटाइजर साफ हुआ, सोचो कोरोना का क्या हुआ होगा? रात नींद में भी खुश्बू आती रही।

सेनेटाइजर बेचने वाले होलसेल विक्रेता बाजार में घूमते मिले, एक से बढ़कर एक सेनेटाइजर के साथ। एक बोतल 50 रुपए से 400 रुपए तक… बोतल का साइज वही, कीमत अलग अलग। यानी, अच्छा वाला ज्यादा कोरोना नाशक होता होगा।

अब सरकार को चाहिए कि वह ऐसा कोई कीट आम आदमी को मुहैया कराए जिससे हाथ साफ करते ही तुरन्त उसे पता चल जाये कि कोरोना मर गया, नहीं तो कैसे पता चलेगा कि सही मायने में कौनसा सेनेटाइजर यूज़ करना है?? 50 वाला, 100 वाला, 200 वाला या उससे भी भारी? काश कोरोना आँख से दिखता तो तुरंत ही कमबख़्त को को सेनेटाइजर सुंघाकर पता करते।

खैर, अब चिंता की कोई बात ही नहीं है। कल एक जून से दो जून की रोटी केलिए बाजार खुले तो लोग टूट पड़े। देखकर तसल्ली हुई कि देश से कोरोना जा चुका है। न सोशल डिस्टनसिंग न कोई कायदा न कानून। इतनी भारी भीड़ देखकर ऐसा लगा कि कोई एलियन्स वगैरह धरती पर उतर गया है, लोगों से पूछा तो मालूम पड़ा अनलॉक हुए है हम??

हे भगवान! मैं हैरान परेशान। इतना पैसा है लोगों के पास। शॉपिंग करते लोग, नाश्तें के पार्सल पैक करवाते लोग, पानी की बोतलें खरीदते लोग, पता नहीं क्या क्या खरीद रहे थे। इतना पैसा कहा छुपाकर रखते हैं यह लोग? घरों में बन्द लोग आत्मनिर्भर बनकर बाहर निकले तो खुशी हुई व गम भी। गम इस बात का कि मैं कमबख़्त पीछे ही रहा, कल भी पिछड़ा हुआ, आज भी पिछड़ा हुआ।

कल से सोच रहा हूँ जब बाज़ार में खाने पीने की चीज़ें तक इम्युनिटी नाम से बिक रही है तो कोई जुगाड़ करके आत्मनिर्भर बन जाता हूँ।

आप लोग ऐसा कोई आइडिया देवे कि मैं क्या बेचकर आत्मनिर्भर बन सकू। वैसे शर्म तो मुझमें बची नहीं है, इसलिए कुछ भी बेच सकता हूँ। आप सिर्फ आइडिया देवे कि क्या बेचना चाहिए। घबराए नही, वैसे भी हम उस युग में है जहाँ बैंगन में भी कोई न कोई इम्युनिटी बताकर बेच सकते हैं। आपके आइडिया का आकांक्षी –

धनराज माली ‘राही’

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मदर्स-डे !! – माँ शब्द के मायने क्या है? मेरे लिए ‘माँ’ हर युग में सिर्फ ‘माँ’ है।

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Mother s Day Maa

मदर्स-डे!! नाम ही इतना भारी भरकम है कि मुझ जैसे मारवाड़ी व्यक्ति को समझ में नहीं आता। जब हिंदी बमुश्किल समझ में आती है तो अंग्रेज़ी कैसे समझ में आएगी। वैसे भी हम लोग माँ को माँ नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा में ‘बाई’ बोलते हैं। वैसे पढ़े लिखे व सज्जन लोग इस शब्द को ‘काम वाली बाई’ समझते होंगे या जिन्होंने इस शब्द को नहीं सुना वो कुछ और सोचते होंगे।

अब लोग अपनी माँ के गले में बाहे डालकर, उसकी गोद में सर रखकर या माँ के साथ विभिन्न तरह की तस्वीरें शेयर कर अपनी भावनाओं को प्रकट करते हैं। मेरी उम्र हालांकि ज्यादा नहीं है लेकिन फिर भी उस दौर से गुजर ही चुका हूं जहाँ तस्वीरें खिंचवाने केलिए कैमरे वाले को घर बुलाना पड़ता था, इसलिए मेरे पास माँ की ज्यादा तस्वीरें नहीं है। माँ के साथ एक दो तस्वीर बमुश्किल मिलेगी। एक दो तस्वीरें हैं, वह भी किसी तीर्थस्थल पर गए थें तब कोई कैमरे वाला साथ था इसलिए।

हा, कई शादियों में तस्वीरें खींचते थें लेकिन वह उन कैमरे में कैद होकर रह जाती थी। दरअसल उन दिनों कैमरे में रील वाला सिस्टम था, जिन्हें धुलवाने केलिए लेब का सहारा लेना पड़ता था। शादी ब्याह में फ़ोटो जरूर खींची जाती थी, लेकिन शादी होते ही सब भूत उतर जाते थें, इसलिए 90 प्रतिशत शादियों की फ़ोटो की रील वर्षों तक घर में मिलती थी, बाद में वह भी फेंक दी जाती थी। फ़ोटो लेब में नहीं धुलवाने की मुख्य वजह आर्थिक स्थिति थी, खैर विषय से न भटककर यही कहा जा सकता है मेरे पास माँ के साथ एक दो फ़ोटो ही है।

कुछ अच्छी फ़ोटो है लेकिन वह हम लोग मरने की तैयारी के स्वरूप खिंचवाते है। यह कड़वी सच्चाई है कि बुजुर्ग लोग अपनी अच्छी फ़ोटो खिंचवाकर रखते थे, ताकि मरने के बाद उनके बच्चे उनका चेहरा देख सके। हालांकि मेरी माँ ज्यादा उम्र की नहीं थी, लेकिन परिस्थितियों ने उसे बीमार किया व उसकी मौत हो गई। हालांकि वह जीना चाहती थी, लेकिन ईश्वर को उसके अधूरे सपनों से सरोकार नहीं था। उसने असमय घण्टी बजाई… और दुनिया की स्कूल से छुट्टी हो गई।  दरअसल मातृ दिवस, मदर्स-डे का लोग कितना पालन करते हैं यह तो नहीं पता, लेकिन सोशल मीडिया पर जो प्यार उमड़ता है वह कुछ सन्देह पैदा करता है।

मै माँ को बाई बोलता था, पुरुष प्रधान समाज में मेरी माँ की दशा बिल्कुल काम वाली बाई की तरह थी। हालांकि मैने वह दौर नहीं देखा लेकिन माँ बताती थी कि घर में घूँघट व मर्यादा में रहना पड़ता था। सबसे अंत में भोजन करती थी। घर में उन दिनों मवेशियों की संख्या ज्यादा थीं, लिहाजा उनकी भी देखरेख में सहयोग करना पड़ता था। पानी लगभग एक किलोमीटर दूर से सर पर रखकर लाना पड़ता था। बहुत सी सामाजिक कुरीतियां उन दिनों थीं, सब उससे दुःखी थे लेकिन साहस किसी में नहीं था। सबकी यही स्थिति थी, लेकिन स्वीकार करने की हिम्मत शायद किसी में नहीं थी, आज भी नही है। हालांकि हम शहर में थे, जिला मुख्यालय पर फिर भी सामाजिक पाबंदियां चरम पर थी।

आज जब हम सोशल मीडिया पर मदर-डे व महिला सशक्तिकरण की बातें पढ़ते है, उनका वास्तविक जीवन में क्या महत्व है मुझे नहीं मालूम! आज की पढ़ी लिखी, सज्जन महिलाएं या सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाली महिलाएं बहुत कुछ लिखती है। कई साहित्यकार महिलाएं, महिलाओं पर बहुत ज्ञान देती है! वह इसलिए कर पाती है क्योंकि उन्हें इन बातों की समझ है। उनकी परवरिश, उनका रहन सहन व उनकी शिक्षा सबका उन पर प्रभाव है। लेकिन डेढ़ किलो चूड़े, पैरों में पौने किलो चांदी के कड़े, चूड़ियों व भीषण गर्मी में मोटे घाघरे, ओरणी में घूँघट की आड़ में पूरा दिन काम करना आज काम वाली बाइयो के बस का विषय नहीं है।

मै जब तक बालिग हुआ तब तक परिस्तिथियां काफी बदल गई थी। चूड़ा बन्द हो गया था, पतली ओरणी पहननी शुरू हो गई थी, पैरों में आधा पौने किलो चांदी के कड़े भी अनिवार्य नहीं थे, दादा दादी थे नही व घर में कोई बड़ा था नहीं इसलिए घूँघट भी समाप्त हो गया था… लेकिन समाज की कुरीतियां फिर भी कुछ जीवित थी।

मेरी माँ पिज़्ज़ा, बर्गर, सैंडविच, पाव भाजी, केक या या बाजारी वस्तु न खाती थी न समझती थी। नाश्ते में चाय के साथ रोटी जैसी परम्परा का चलन था। हा, प्यार वह बिल्कुल आधुनिक माँ जैसा ही करती थी। मुंह भी बनाती थी लेकिन सेल्फी का चलन नहीं था। सब्ज़ी खराब लगने पर वह गुड़ व घी के साथ में रोटी खिलाती थी, पिताजी से छुपकर। साधारण परिवार होने के बावजूद मेरे मांगने पर पता नही कहा से पैसे लाकर देती थी। उसकी मौत के बाद उसकी पेटी से निकले पैसों ने मुझे जिंदगी का मैनेजमेंट समझा दिया था, लेकिन देर हो चुकी थी… पंछी उड़ चुका था।

मुझे माँ की याद आज भी सोने नही देती। पता नही किस मिट्टी की बनी थी, कभी किसी से कोई शिकायत नहीं थी। हर वक़्त खुश रहती थी व सबको खुश रखती थी। लगता नही था कि उसे जिंदगी से कोई शिकायत थी। कुछ अधूरी हसरतों से शायद वह चली गई, इस बात का अफसोस आज भी है। काश उन दिनों मोबाइल का चलन होता तो माँ की गोद में सर रखकर सोते हुए बहुत फ़ोटो खिंचवाता। काश आज माँ होती तो उसके साथ दूर आसमां धरती के मिलन वाली जगह तक पैदल चलता… उससे ढेर सारी बातें करता। बहुत बातें दिल में थी, माँ से कहनी थी लेकिन….।
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